बृज मण्डल - मथुरा एवं अन्य स्थान

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Dwarkadeesh Mandir Mathura

 आलेख   का  दूसरा  भाग  ब्रजभूमि  के  अन्य  स्थानों  का  विवरण  देता  है| पहले  भाग  को  पढ़ने  के  लिए

बाललीला का गोकुल धाम

गोकुल मथुरा से 18 किमी की दूरी पर यमुना के दूसरे तट पर बसा हैयहीं पर रोहिणी जी ने बलराम जी को जन्म दिया। बलराम जी देवकी जी के सातवे गर्भ में थे जिन्हें योगमाया ने रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया था। मथुरा के कारागार में कृष्ण जन्म के समय कंस के सभी सैनिकों को निंद्रा आगयी थी तथा वासुदेव जी की बेड़ियाँ खुल गयी थी। तब वासुदेव ने कृष्ण को गोकुल में नन्दराय जी के यहाँ छोड़ आये। श्री कृष्ण और बलरामजी का पालन-पोषण गोकुल में हुआ, जहां दोनों अपनी लीलाओं से सभी को मंत्रमुग्ध करते थे | भगवान श्री कृष्ण ने गोकुल में रहते हुए पूतना, शकटासुर, तृणावर्त आदि असुरों को मोक्ष प्रदान किया।

 

गोकुल से कुछ आगे महावन है जिसे पुराना गोकुल भी कहा जाता हैं। यहां पर उनसे जुडे़ कई स्थल है। जिनमें पूतना उद्धार स्थान, नन्द महावन का टीला, गोपियों की हवेली कई मन्दिर है। यहीं पर ब्रह्माण्ड घाट है जहां कृष्ण ने अपनी लीला से मुह खोल मां यशोदा को ब्रह्माण्ड दर्शन कराये थे। गोकुल में वह मन्दिर भी है जहां से कृष्ण जन्माष्टमी का सीधा प्रसारण होता है।

 

नन्दगांव

नन्दगाँव श्री नन्दराय जी एवं उनके पूर्वजों की निवास स्थली है। किन्हीं कारणवश वे बाद में गोकुल (महावन) जाकर बस गये। जिस समय श्री कृष्ण भगवान का जन्म हुआ उस समय नन्दराय जी गोकुल में ही रहते थे। कृष्ण जन्म के बाद सभी गोकुलवासी कंस के आतंक से भयभीत थे सुझाव दिया गया कि यमुना के पार एक सुन्दर वृन्दावन है जहाँ अनेक वन, वृक्ष, नदी तट, गोवर्धन पर्वत आदि हैं। इसके बाद वृन्दावन को अपना निवास स्थल बनाया। गोवर्धन, बरसाना, नन्दगाँव आदि भी वृन्दावन की परिसीमा में आते थे। मथुरा से 22 किमी की दूरी पर गोवर्द्धन पर्वत है। इन्द्र ने अपनी पूजा बन्द करने से से कुपित होकर जब वहां अतिवृष्टि की तो श्री कृष्ण ने उस पर्वत को अपनी तर्जनी पर उठा कर उसके नीचे ब्रजवासियों को आश्रय प्रदान किया।

 

नन्दगाँव के दर्शनीय स्थल

नन्दगाँव में नन्दभवन प्रमुख मन्दिर है जो नन्दीश्वर पहाड़ी पर बना है। इसमें नन्दराय माँ यशोदा, रोहिणी एवं श्री कृष्ण-बलदेव के साथ विराजमान हैं। यहां पर दोनों ने अपने बाल एवं किशोर अवस्था की बहुत सी लीलायें की हैं। यशोदा कुण्ड में यशोदा प्रतिदिन दोनों को स्नान कराने को आती थी  

राधारानी का गांव- बरसाना

यह स्थान मथुरा से 42 किमी दूर है। नन्द जी जब अपने परिवार, गौधन के साथ गोकुल छोड़कर नन्दगाँव चले आये तो उनके के साथ ही उनके मित्र वृषभानु जी नन्दगाँव के निकट बसे। राधा रानी उन्हीं की पुत्री थी। उन्हीं के नाम से इस जगह का नाम बरसाना हुआ। नन्दगाँव से बरसान 7 किमी दूर है।यहाँ पर स्थित ब्रह्मगिरी पर राधा रानी और उनके पिता वृषभानु का भव्य मन्दिर बना है। यहां से 4 किमी दूर संकेत गांव वह जगह है जहां कृष्ण का राधा का पहली बार मिलन हुआ था। बरसाना गाँव लटठमार होली के लिये प्रसिद्ध है जिसे देखने के लिये हजारों भक्त एकत्र होते हैं।

Nandbhavan Mandir Nandgaon Holi 2016

कृष्ण जन्मस्थली मथुरा

 

मथुरा के उत्तर में हरियाणा का फरीदाबाद, दक्षिण में आगरा, पूर्वोत्तर में अलीगढ़, पूरब में इटावा एवं पश्चिम में राजस्थान का भरतपुर जिला है। मथुरा में कृष्ण जन्म होने के कारण उसे पावन भूमि कहा जाता है। उसे सात पुरियो जिनमें अयोध्या, मथुरा, कांची काशी, माया, अवन्ती, द्वारावती में सबसे प्रमुख माना जाता हैं। यहां पर भगवान श्री राम के अनुज शत्रुघ्न ने लवणासुर का वध कर मथुरावासियों को उसके भय से मुक्ति दिलाई थी। द्वापर युग में इसी स्थान पर मथुरा के राजा कंस के कारागार में देवकी के आठवें गर्भ से श्री कृष्ण का जन्म हुआ था। श्री मद्भागवत के रचियता श्री व्यास जी का ब्रज से सम्बंध सर्वविदित है। श्री कृष्ण की जन्मादि की विविध लीलाओं की यह स्थली रही है। यमुना किनारे स्थित इस नगरी में अनेक मन्दिर घाट आदि है।

 

मथुरा के दर्शनीय स्थल 

 

श्रीकृष्ण जन्मभूमि मन्दिर - यह मथुरा का सबसे प्रमुख मन्दिर है जिसका निर्माण श्री कृष्ण जी के प्रपौत्र श्री बज्रनाभ जी ने कराया था। इसका दूसरा निर्माण महाराजा विक्रमादित्य ने किया था एक धार्मिक नगरी को देखते हुये इस पर अनेकों मुस्लिम मुगल शासकों ने हमला कर बार बार इस मन्दिर को ध्वस्त किया। इस भव्य मन्दिर को सर्वप्रथम महमूद गजनवी ने इस पर आक्रमण कर लूटा घ्वस्त किया। ऐसा मन्दिर तब कही नहीं था। जिसको कन्नौज के राजा विजयपाल देव ने संवत 1207 में फिर से बनाया। 

 

इस देवालय को सिकंदर लोधी ने ध्वस्त कर दिया। जिसका 125 साल बाद ओरछा नरेश ने पुनःनिर्माण कर यहां पर 250 फीट ऊंचा भव्य मन्दिर बनाया। इसके शिखर पर ढाई मन का घी का दिया जब जलता था तो उसका प्रकाश आगरा से दिखता था। औरंगजेब से यह देखा गया और 1669 ई० में उसने इस मंदिर को ध्वस्त करा कर निकट में मस्जिद बनवा दी। औरंगजेब की मौत के बाद यह स्थान घ्वस्त हालत में ही रहा। कालानतर में बनारस के राजा पटनीमल ने मंदिर की भूमि को अंग्रेज सरकार से 1815 ई० में खरीद दिया। पर वे इस पर मंदिर  बना सकें। कल्याण के संपादक हनुमान प्रसाद पोद्धार जी की प्रेरणा से बहुत बाद में इस पर मन्दिर बनाया गया। इसके निचले भाग में कंस का कारागार है। 

 

इस मन्दिर में जाने के लिये के कड़ी सुरक्षा से गुजरना होता है किसी भी प्रकार की फोटाग्राफी यहां पर वर्जित है। देशी एवं विदेशी पुराविद इस स्थान को कृष्ण जन्म स्थान मानते है। इस मन्दिर में दर्शन के लिये हर समय काफी भीड़ मिलती है। 

 

द्वारकाधीश मन्दिर - यह भी मथुरा का एक प्रमुख विशाल यह 80 फीट चैड़ी 120 फीट लम्बी वेदिया पर बना है। शिल्प की दृष्टि से यह एक सुन्दर मन्दर है। इसमें दिन में आठ बार आरती होती है। मन्दिर के समीप असीकुण्ड घाट है। जहां पर यमुना जी का मन्दिर है यहां पर सांयकाल के समय यमुनाजी की आरती होती है। मथुरा में कई दूसरे मन्दिर भी विद्यमान है मथुरा का राजकीय संग्रहालय भी दर्शनीय हैं जहां मथुरा के आस पास से निकल अनेक बौद्ध हिन्दू मूर्तियां प्रदर्शित हैं। 

 

मथुरा में सबसे अधिक दर्शनार्थी कृष्ण जन्माष्टमी के समय आते हैं तब पूरी ब्रज भूमि के मन्दिरों में तिल धरने को भी स्थान नहीं होता है। लगभग हर मन्दिर में साज सज्जा विशेेष पूजायें होती है। बांके बिहारी और द्वाराकाधीश कृष्ण जन्मभमि मन्दिर में श्रद्धालुओं की अपार संख्या यहां दिखती है। सालों भर मथुरा में तीर्थयात्री आते रहतें हैं |

 

कैसे पहुंचे  

ब्रजभमि में आने के लिये मथुरा आना होता है जो दिल्ली से मात्र 145 किमी दूर है। राष्ट्रीय राजमार्ग एक्सप्रेस वे दोनो ही यहा से गुजरते हैं आगरा यहां से मात्र 50 किमी की दुरी पर है | मथुरा एक रेल प्रमुख जंक्शन है जहां देश के हर भाग के रेलगाड़ियों मिल जाती हैं। निकटतम हवाई अड्ड़ा आगरा में है। रहने के लिये अनेको धर्मशालाये एवं होटल उपलब्ध है। यहां घूमने के लिये कम कम तीन दिन चाहिये होते हैं। होली के समय ब्रजबरसान में काफी भीड़ होती है।