नारायण का आदिधाम- बदरीनाथ

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Front view of Badrinath Mandir

नारायण का आदिधाम- बदरीनाथ

देश में हिंदुओं की आस्था के चार प्रमुख धाम हैं जिनमें पश्चिम में द्वारका, पूर्व में जगन्नाथपुरी, दक्षिण में रामेश्वरम  उत्तर में बदरीनाथ धाम है।बदरीनाथ उत्तराखण्ड राज्य में हिमालय की उपत्यिका में बसा है।यह विष्णु का एकमात्र प्रकाट्य स्थल भी है। इसलिये इसे हिन्दुओं का प्रमुख  पवित्र धाम माना गया है।कुछ लेखकों ने धर्म पुस्तकों के आधार पर अलग अलग युगों में बदरीनाथ की पहचान मुक्तिप्रदा, योगसिद्धा, विशाला से की है।वर्तमान कलियुग में यह धाम बदरीनाथ नाम से ख्यात जिसे बदरी-नारायण, बदरीविशाल आदि कहा जाता है। यह गन्धमादन पर्वतक्षेत्र में बसा है।धाम के निकट से गंगा की मुख्य सहायक नदी अलकनन्दा प्रवाहमान है।

मूल रूप से यह धाम विष्णु के नारायण रुप को समर्पित है। युगों पूर्व यहां ऋषि नारायण का आश्रम था।नर  नारायण उनके दो पुत्र हुये जो विष्णु के अवतार माने गये।नारायण को यह स्थान इतना पंसद आया कि उन्होंने इस शिवभूमि में तपस्या करने का निश्चय किया।इसके लिये उन्होंने बालक बनकर शिव  पार्वती से यहां विराजने की अनुमति ली।इसके बाद शिव एवं पार्वती केदार पहुंच कर भक्तों दर्शन देने लगे।नारायण जब तपस्यारत थे तो लक्ष्मीजी बदरी के वृक्ष के रूप में उनको संरक्षण देती रही।इससे बदरी को लक्ष्मी का प्रतीक, इस वन को बदरीवन  नारायण बदरीनाथ कहलाये।इस मन्दिर में विष्णु के अलावा कुबेर, नर नारायण  नारद की भी पूजा होती है।

ऐतिहासिक पक्ष

मन्दिर का ऐतिहासिक पक्ष कथानकों  श्रुतियों में मिलता है। कई श्रुतियां है।इनमें सबसे प्रमुख यह कि बदरीनाथ जी की आदि काल से पूजा होती रही है।जब बौद्ध काल का प्रादुर्भाव हुआ तो बौद्ध यहां पर इसे बुद्ध की मूर्ति मानकर पूजा करने लगे।आठवी सदी में शंकराचार्य सनातन धर्म की पुर्नस्थापना के प्रचार-यात्रा पर भारत भ्रमण पर थे तो बौद्ध तिब्बत की ओर निकले गये। जाते-जाते उन्होंने इस मूर्ति अलकनन्दा में नारदकुण्ड में फेंक दिया था।शंकराचार्य जी जब बदरीनाथ आये तो उन्होंने विष्णु की इस चतुर्भज मूर्ति को नारदकुण्ड से निकाला और रामानुजस्वंामी ने तप्तकुण्ड के निकट गरुडकोटि नामक गुफा में स्थापित किया।पूजा के लिये सनातनी पूजा का विधान स्थापित करने के साथ उन्होंनें अपने शिष्य को यहां रख छोड़ा।फिर तदनुसार यहां पूजा होती रही।पन्द्रहवीं शती में जब गढ़वाल राज्य अस्तित्व में आया तो रामानुज सम्प्रदाय के स्वामी बरदराज जी की प्रेरणा से गढ़वाल नरेश से यहां पर पुराने मन्दिर का जीर्णाद्धार करवाया और इसे नया रूप दिया। मन्दिर के लिये संचालन के लिये व्यवस्थायें बनाई गई। तब से यह इसका संचालन अलग-अलग व्यवस्थाओं के तहत हुआ।वर्तमान में इसका संचालन सरकार द्वारा नामित बंदरीनाथ केदारनाथ मन्दिर समिति करती है। 

पुरादृष्टि से वर्तमान मन्दिर की संरचना बहुत प्राचीन नहीं है। वर्तमान मन्दिर पुराने मन्दिर का नवीकृत रूप है। इसका सिंह द्वार समय-समय पर सुधारा जाता रहा है।सिंह द्वार से प्रवेश करने पर इसके अन्दर दक्षिण भारत की तरह ही सभा मण्डप  दर्शन मण्डप है। हालांकि यह मण्डप या कक्ष बहुत ही छोटे है।सबसे अन्त में वह गर्भगृह जहां ध्यानस्थ में भगवान विष्णु की चतुर्भज मूर्ति है।8वीं सदी में केरल में जन्मे शंकराचार्य जी ने सनातन धर्म को फिर से स्थापित करने का संकल्प लेकर चार दिशाओं में चार धामों की स्थापना की।उन्होंने ही वर्तमान जोशीमठ में ज्योर्तिमठ स्थापित किया। आज भी मन्दिर के मुख्यपुजारी केरल के नम्बूदरी जाति के अविवाहित ब्राह्मण होते हैं।   

बौद्ध मतावलम्बी इस मूर्ति को तिब्बत के थोलिंगमठ से लाई बताते हैं। उनकी भी इसमें आस्था है। वहीं जैन लोग इसे ऋषभदेव जैन की मूर्ति मानते है।हिन्दुओं में भगवान बौद्ध  ऋषभदेव को विष्णु का अवतार माना गया है।

कपाट खुलने का विधान

मन्दिर में वर्ष में छह माह तक ही पूजा  दर्शन का विधान है जबकि शेष 6 माह के लिये यह शीतावकाश में बंद रहता है। शीतकाल में यह धम 10 से 15 फीट बर्फ से ढक जाता है।शीतकाल में बदरीनाथ जी की पूजा 55 किमी दूर जोशीमठ में होती है। यहीं पर रावल का निवास होता है।शीतकाल में बदरीनाथ जी के कपाट बंद हाते हैं तो उनकी उत्सव मूर्ति जो कि उद्धव जी की मूर्ति होती लक्ष्मी जी के साथ पाण्डुकेश्वर में स्थापित कर दी जाती है।मन्दिर के कपाट खुलने से उत्सव डोली के साथ बदरीनाथ जी यहां पधारते हंै।टिहरी नरेश के प्रतिनिधि मन्दिर के कपाट खुलने की समय वहां पर मौजूद रहते है और मन्त्रोचार के साथ खुलता है।कपाट के खुलने के समय मन्दिर में अखण्ड ज्योति को देखने को बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का तांता रहता है।

ग्रीष्मकाल में कपाट खुलने का समय बसंतपंचमी के दिन टिहरी राजा के महल नरेन्द्रनगर में तय होता है। इसके बाद यहां कुंवारी कन्याओं के द्वारा तिल से तेल निकाला जाता है।इस तेल को जिस घड़े में रखा जाता है उसे गाडू घडा कहा जाता है। कपाट खुलने से 15 दिन पूर्व इसे बदरीनाथ पहुंचाया जाता है।कपाट खुलने के बाद से इसी तेल से बदरीनाथ जी का अभिषेक होता है।शीतकाल में इसके बंद होने का दिन तय होता है।इसके बाद गिने चुने साधू संत  सेना के लोग यहां पर रहते हंै। 

पूजा पद्धति

हर धाम में पूजा का दैनिक विधान होता है इसका भी पूजा विधान दक्षिण के दूसरे मन्दिरों जैसा तो है किन्तु कुछ अलग भी। मन्दिर प्रातः चार बजे खुलता है।इसके बाद मुख्यपुजारी स्नान करने के बाद इसका श्रंगार  अभिषेक करते हंैं। इसके बाद यहां दर्शन का क्रम शुरू होता है।12 बजे दोहपर में आरती के बाद मन्दिर सांय चार बजे तक बंद रहता है।इस बीच में दिन में मूर्ति को भोग लगाया जाता है।सायं चार बजे मन्दिर फिर खुलता है और सायंकालीन आरती के बाद रात्रि 8 बजे बंद होता है।मन्दिर में तप्त कुण्ड में स्नान कर दर्शन करने की परम्परा है।गरुड़ शिला के नीचे से निकलने वाला गर्मपानी ही तप्त कुण्ड में आता है। यात्रीगण दर्शन से पहले इसमें पवित्र स्नान करते हंै।गन्धक युक्त इस पानी को त्वचा से सम्बन्धित रोगों के लिये लाभकारी माना जाता है।यहाँ वन तुलसी की माला, चने की कच्ची दाल, गिरी का गोला और मिश्री आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है।

बदरीनाथ की स्थिति

देश के तीन प्रमुख धाम समुद्र तटों पर है वहीं बदरीनारायण धाम उच्च हिमालय क्षेत्र में लगभग 10500 फीट की ऊंचाई पर बसा है।मन्दिर के पृष्ठ में नर नारायण पर्वत है जिसके एक दम पीछे हिमाच्छादित नीलकण्ठ शिखर है। बदरीनाथ धाम गंगा की प्रमुख सहायक नदी अलकनंदा नदी के किनारे स्थित है।माणां गांव से कुछ आगे घाटी में सरस्वती अलकनन्दा का ंसगम होता है। स्थान बदरीनाथ में टाउन एरिया है किन्तु इसके लिये चुनाव नहीं होते है।ग्रीष्म काल में इसके कपाट खुलने के बाद से यहां पर स्थाई आबादी लगभग साढे तीन हजार तक जा पहुंचती है जो यहां आने वाले यात्रियों से अलग होती है।आज यहां पर सालाना 5 से 6 लाख यात्री पहुचते हंै।

मन्दिर परिसर के महत्वपूर्ण स्थल

बदरीनाथ मन्दिर के समीप एवं मन्दिर परिसर में कई मूतिर्यों का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व है। मन्दिर के बाहर समीप में आदिकेदारेश्वर मन्दिर है।इसका स्कन्द पुराण में वर्णन है जो श्रद्धालु केदारनाथ नहीं जा सकते हैं वे यहां दर्शन लाभ ले सकते हैं। केदारेश्वर मन्दिर वही स्थान है जहां पहले केदारनाथ जी प्रतिस्थापित थे।मन्दिर के निकट तप्तकुण्ड से कुछ दूरी पर श्ंाकराचार्य जी का मन्दिर है जिसमें आदि गुरु शंकराचार्य की मूर्ति है।आदि गुरु शंकराचार्य को शिव का अवतार माना जाता है जिन्होंने सनातन धर्म की पुर्नस्थापना के लिये भारतभूमि पर जनजागरण किया।

 मन्दिर के प्रवेश यानि सिंह द्वार के समीप गरुड़ की मूर्ति है जो कि विष्णु के वाहन हैं। परिक्रमा पथ पर गणेश जी की मूर्ति है। कपाट खुलने पर पहली पूजा गणेश जी की होती है।मन्दिर के परिक्रमा पथ में दक्षिणमुखी हनुमान की मूर्ति है। परिसर में ही महालक्ष्मी जी का मन्दिर है।जब नारायण यहां पर तपस्यारत थे लक्ष्मी जी ने बदरी की झाड़ी के रूप में उनको संरक्षण प्रदान किया था।अन्दर ही शंकराचार्य की गद्दी है जो कपाट बंद होने पर जोशीमठ में 6 माह के लिये स्थापित की जाती है  खुलने पर इसे मन्दिर परिसर में स्थापित किया जाता है।पीछे एक बउत्रे पत्थर पर शेषनेत्र की आकृति है। नदी की धारा के कुछ विपरीत चल कर एक चबूतरा ब्रह्मकपाल है।यहां पर हिन्दू धर्मावलम्बी पर आत्मा की मुक्ति के लिये पिण्डदान का कार्य करवाते हैं। पिण्डदान हेतु यह गया से अधिक पवित्र माना गया है।यही समीप में धर्मशिला है जहां गायदान की रश्म होती है।

निकटवर्ती स्थल

मन्दिर से लगभग किमी की दूरी पर दायीं ओर नारायण शिखर के आधार पर माता मूर्ति मंदिर है जिन्हें नारायण की माता के रूप में पूजा जाता है।नर नारायण पर्वत के एक दम पीछे बर्फ से ढंका ऊँचा शिखर नीलकंठ शिखर है। माणा गाँव-यह गांव मन्दिर से तीन किमी की दूरी पर है जो जनजाति के लोगों का परम्परिक गांव है।शीतकाल में यहां के निवासी निचले इलाकों की ओर चले आते है और कपाट खुलने से साथ ही वहां पहुचते हैं। उनका एक समय भेड़ों का मुख्य कारोबार हुआ करता था।वे जड़ी बूटियां का संग्रहण  ऊनी वस्त्रों को बनाने का कार्य करते रहे हंै। माण से पूर्व पहलंे सेना के कैम्प हैं।व्यासगुफा एवं गणेष गुफा- बसुधारा सतोपंथ मार्ग पर व्यासगुफा है जहां रहकर ऋषि व्यास ने वेदों का सृजन किया। इसके समीप ही गणेश गुफा है।मान्यता है कि गणेश जी ने वेद व्यास के मुख से निकली वाणी को चैव्वन ग्रन्थों में लिपिबद्ध किया था।भीमपुल- माणा से कुछ दूर सतोपंथ जाने वाले मार्ग पर कुछ दूर सरस्वती नदी है जो एक चट्टान के नीचे से गुजरती है।महाभारत युद्ध के बाद जब पाण्डव यहां से गुजर रहे थे राह में सरस्वती नदी के प्रवाहमान होने से उनका मार्ग अवरुद्ध होने पर भीम ने इस नदी पर एक भारी चट्टान को रखा जिसे भीम पुल जाना जाता है। दायीं हाथ की ओर का रास्ता तिब्बत सीमा के लिये चला गया है। उस ओर प्रवेश की मनाही है। 

वसुधारा- माणा से लगभग 5 किमी की दूरी पर बसुधारा प्रपात है यहां पर जलधारा 500 फीट की ऊंचाई से गिरती है। कहा जाता है यहां अष्ट वसुओं ने तपस्या की थी।कहते हैं की जिसके ऊपर इसकी बूंदें पड़ जायें उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। सतोपंथ (स्वर्गारोहिणी)- इस स्थान से राजा युधिष्ठिर ने सदेह स्वर्ग को प्रस्थान किया था।इसे धन के देवता कुबेर का भी निवास स्थान माना जाता है। यहां पर सतोपंथ झील है जो बदरीनाथ धाम से 24 किमी. दूर है। यहीं से अलकनंदा नदी का उद्गम होता है।इस मार्ग पर बर्फीली चोटियों के बीच से आकर कई हिमानियां नदी में मिलती है  इसका परिमाण बढ़ाती है।कई श्रद्धालु  पर्यटक सतोपंथ तक की कठिन यात्रा करते हंै और इसमें स्नान करते हैं।बदरीनाथ के अतिरिक्त चार अन्य बदरी मन्दिर आदिबदरी, योगबदरी, वृद्धबदरी, ध्यानबदरी हंै जिनका अपना महात्मय है।

कैसे आयें

बदरीनाथ जाने के मुख्य मार्ग ऋषिकेश से है जहां से इस धाम की सड़क दूरी लगभग 295 किमी. है।कुछ यात्री 25 किमी पहले हरिद्वार से यात्रा आरम्भ करते हैं जो एक बड़ा रेलवे स्टेशन है।कुमांयू अंचल की ओर से आने वाले हल्द्वानी एवं रामनगर प्रमुख रेल हेडांे से लगभग 150-160 किमी दूर कर्णप्रयाग होकर यहां पहंुचा जा सकता है।कर्णप्रयाग मुख्य यात्रा मार्ग पर है जहां से बदरीनाथ 130 किमी. है। एक और विकल्प रेल हेड कोटद्वार से भी है जो 135 किमी दूर श्रीनगर में मुख्यमार्ग से जा मिलता है।श्रीनगर से बदरीनाथ की दूरी लगभग 190 के आस पास है। श्रीनगर से ऋषिकेश या कर्णप्रयाग मार्ग अवरुद्ध होते पर वाहन वैकल्पिक रास्तों से निकलते हैं।उत्तराखण्ड के चार धामों में इस धाम के दर्शन सबसे बाद में किये जाते है।ऐसे में केदारनाथ की यात्रा के बाद एक वैकल्पिक मार्ग वाया ऊखीमठ से निकल कर चमोली में मुख्य यात्रा मार्ग से जा मिलता है।कुछ लोग यहां चार धामों के दर्शन करते हैं तो कुछ दो धाम तो कुछ मात्र बदरीनाथ धाम के दर्शन पर आते हैं।इन सड़क मागों के अलावा अब हवाई मार्ग से भी बदरीनाथ आया जा सकता है जिसके लिये देहरादून, हरिद्वार, एवं गौचर से चार्टेड हेलीकाप्टर सेवायें चलती हैं।

Author has thirty years of writing experience. He is a well-known travel writer in Hindi since 15 years. He has written for Dainik jagran, Kadambini, Bhartiya, Awara Musafir, Tribune Hindi etc.

 

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