अरावली
पर्वतमाला
भारत
की
सबसे
प्राचीन
पर्वत
श्रृंखला
मानी
जाती
है,
जिसकी
उत्पत्ति
भौगोलिक
संरचना
प्रणाली
व सूदूर
तकनीक
(प्रीकैम्ब्रियन)
युग
में
हुई
थी।
यह
पर्वतमाला
उत्तर-पश्चिम
भारत
में
जलवायु
संतुलन,
मरुस्थलीकरण
नियंत्रण,
जैव-विविधता
संरक्षण
तथा
मानव
सभ्यता
के
विकास
में
महत्वपूर्ण
भूमिका
निभाती
रही
है।
वर्तमान
में
यह
पर्वतमाला
तीव्र
शहरीकरण,
खनन,
अवैध
अतिक्रमण
एवं
पर्यावरणीय
उपेक्षा
के
कारण
गंभीर
संकट
का
सामना
कर
रही
है।
अब
अरावली
की
भौगोलिक
संरचना,
ऐतिहासिक
महत्त्व,
पारिस्थितिकीय
भूमिका,
वर्तमान
चुनौतियाँ
तथा
संरक्षण
की
अध्यन
की
आवश्यकता
का
विस्तृत
विश्लेषण
जरूरी
है। यहां
पर्वतमाला
भारत
की
ही
नहीं,
बल्कि
विश्व
की
प्राचीनतम
पर्वत
श्रेणियों
में
से
एक
है।
इसका
भौगौलिक
विस्तार
लगभग
800
किलोमीटर
तक
है,
जो
गुजरात
के
पालनपुर
से
प्रारंभ
होकर
राजस्थान,
हरियाणा
और
दिल्ली
तक
फैला
हुआ
है।
यह
पर्वतमाला
भारतीय
उपमहाद्वीप
की
भूगर्भीय
संरचना
को
समझने
में
महत्वपूर्ण
साक्ष्य
प्रदान
करती
है।
अरावली
शब्द
संस्कृत
के “अर” (चट्टान)
और “वली” (श्रृंखला)
से
मिलकर
बना
है,
जिसका
अर्थ
है–चट्टानों
की
श्रृंखला।
यह
एक
अवशिष्ट
पर्वतमाला
है,
जिसकी
औसत
ऊँचाई
300–900 मीटर
के
बीच
है।
गुरु
शिखर
(माउंट
आबू)– इसकी
सर्वोच्च
चोटी
(लगभग
1722 मीटर)
है।
यह
पर्वतमाला
पश्चिम
में
थार
मरुस्थल
और
पूर्व
में
उपजाऊ
मैदानों
के
बीच
प्राकृतिक
अवरोध
का
कार्य
करती
है।
जो
इसकी
प्रमुख
भौगोलिक
विशेषता
दशार्ती
है।
इसका
भूगर्भीय
एवं
ऐतिहासिक
महत्व
है।
यह
पर्वतमाला
भारतीय
प्लेट
के
प्रारंभिक
विकास
की
गवाह
है।
अरावली
क्षेत्र
में
हड़प्पा
सभ्यता
के
अवशेष
मिले
हैं
यहां मेवाड़,
मारवाड़
और
आमेर
जैसे
राजपूत
राज्यों
का
प्राकृतिक
सुरक्षा
कवच
रहा
है।
यह
पर्वतमाला
व्यापारिक
मार्गों
और
सांस्कृतिक
संपर्क
का
भी
माध्यम
रही हैं
जो
इसे
ऐतिहासिक
महत्व
प्रदान
करते
हैं।
यह
पर्वतमाला
भारत
की
भूगर्भीय
विरासत,
पर्यावरणीय
संतुलन
और
सांस्कृतिक
पहचान
का
प्रतीक
है।
यदि
इसका
विनाश
जारी
रहा,
तो
उत्तर-पश्चिम
भारत
को
मरुस्थलीकरण,
जल
संकट
और
जलवायु
असंतुलन
जैसी
गंभीर
समस्याओं
का
सामना
करना
पड़ेगा।
अतः
समय
की
माँग
है
कि
इसको
केवल
पहाड़ियों
की
श्रृंखला
नहीं,
बल्कि
जीवन
रेखा
के
रूप
में
देखा
जाए
और
इसके
संरक्षण
के
लिए
ठोस
नीतिगत
एवं
सामाजिक
प्रयास
किए
जाएँ।
यह
पर्वतमाला
भारत
की
सबसे
प्राचीन
पर्वत
श्रृंखला
होने
के
साथ-साथ
जैव-विविधता
की
दृष्टि
से
भी
अत्यंत
महत्वपूर्ण
पारिस्थितिक
क्षेत्र
है।
यह
पर्वतमाला
थार
मरुस्थल
और
गंगा
के
मैदानों
के
बीच
एक
संक्रमण
क्षेत्र
के
रूप
में
कार्य
करती
है,
जहाँ
शुष्क,
अर्ध-शुष्क
और
आर्द्र
पारिस्थितिकी
तंत्र
एक
साथ
विकसित
हुए
हैं।
वनस्पतियों,
स्तनधारियों,
पक्षियों,
सरीसृपों
और
सूक्ष्म
जीवों
की
विविधता
अरावली
को
उत्तर-पश्चिम
भारत
का
जैविक
सुरक्षा
कवच
बनाती
है।
वर्तमान
में
मानवीय
हस्तक्षेप
के
कारण
इसकी
जैव-विविधता
गंभीर
संकट
में
है,
जिससे
संरक्षण
की
आवश्यकता
और
अधिक
बढ़
जाती
है।
जैव-विविधता
किसी
क्षेत्र
की
जैविक
संपदा
का
द्योतक
होती
है,
जिसमें
वनस्पति,
जीव-जंतु,
सूक्ष्म
जीव
तथा
उनके
पारिस्थितिक
संबंध
शामिल
होते
हैं।
यह
पर्वतमाला
उन
कुछ
क्षेत्रों
में
से
एक
है
जहाँ
अत्यंत
प्राचीन
भूगर्भीय
संरचना
के
साथ
समृद्ध
जैव-विविधता
का
विकास
हुआ
है।
यह
उत्तर-पश्चिम
भारत
की
जलवायु,
मिट्टी
और
जल
संसाधनों
को
नियंत्रित
करने
में
सहायक
है।
इसी
कारण
यहाँ
विविध
प्रकार
की
वनस्पतियाँ
और
जीव-जंतु
पाए
जाते
हैं।
इसलिए
इसका
बहुत
अधिक
पारिस्थितिक
महत्व
हैं।
इस
पर्वतमाला
को
एक
संक्रमण
जैव-भौगोलिक
क्षेत्र
माना
जाता
है,
जहाँ
मरुस्थलीय,
अर्ध-शुष्क
क्षेत्र
की
और
उष्णकटिबंधीय
पर्णपाती
वन
प्रजातियाँ
एक
साथ
पाई
जाती
हैं।
इस
पर्वतमाला
में
मुख्यतः
शुष्क
एवं
उष्णकटिबंधीय
पर्णपाती
वन
पाए
जाते
हैं।
जो
इसकी
वनस्पति जैव
-विविधता
को
महत्वपूर्ण बनाता
है
, जिसकी
प्रमुख
वनस्पति
प्रकारों
में
शुष्क
पर्णपाती
वन
,कांटेदार
वन
,घासभूमि
एवं
झाड़ीदार
वन
पाये
जाते
हैं
इसकी
प्रमुख
वृक्ष
प्रजातियों
में
खेजड़ी,
ढाक
, पलाश,
अर्जुन
,नीम,
पीपल,
बड,सालर,
अर्डु,
बेर,
खैर
आदि
व औषधीय
एवं
आर्थिक
महत्व
की
वनस्पतियों
में
गिलोय,
अश्वगंधा,
गुग्गुल,सफेद
मुसली
आदि
पाये
जाते
हैं।
अरावली
की
वनस्पतियाँ
सूखे
और
कम
वर्षा
की
परिस्थितियों
में
भी
जीवित
रहने
में
सक्षम
हैं,
जो
इन्हें
विशिष्ट
बनाती
हैं।
यहां की
जीव-जंतु
जैव-विविधता
में
अनेक
वन्य
स्तनधारियों
का
प्राकृतिक
आवास
है
जिनमें
तेंदुआ,
बाघ,
भेड़िया,
सियार,नीलगाय,
जंगली
सूअर,लकड़बग्घा,
लोमड़ी
आदि
हैं।
यह
क्षेत्र
विशेष
रूप
से
तेंदुओं
के
लिए
एक
महत्वपूर्ण
गलियारा
है। पक्षी
जैव-विविधता
लिहाज
से
यह
पक्षियों
के
लिए
अत्यंत
अनुकूल
आवास
प्रदान
करती
है।
जिसमें
मोर,
चील,
बाज,उल्लू
,तोता,
गोडावण,
खमोर,
तीतर
आदि
हैं।
यह
क्षेत्र
स्थानीय
और
प्रवासी
पक्षियों
दोनों
के
लिए
महत्त्वपूर्ण
है।
जिनमें
फ्लेमिंगो
, बड
प्रकार
की
क्रेन
है,
जो
तिब्बत,
हिमालय,
साईबेरिया
से
आती
है।
सरीसृप
एवं
उभयचर
में
भारतीय
अजगर, कोबरा,
करैत,
कई
प्रकार
की छिपकली,
मॉनिटर
लिज़र्ड,
आदि
पाई
जाती
हैं। इसका
पथरीला
भूभाग
सरीसृपों
के
लिए
उपयुक्त
आवास
प्रदान
करता
है।
कीट
एवं
सूक्ष्म
जीव
में मधुमक्खियाँ,
तितलियाँ,
दीमक,
मृदा
जीवाणु
एवं
कवक
है।
यह
जीव
पारिस्थितिक
संतुलन,
परागण
और
मृदा
उर्वरता
बनाए
रखने
में
महत्वपूर्ण
भूमिका
निभाते
हैं।
इस
क्षेत्र
की
जैव-विविधता
स्थानीय
समुदायों
की
आजीविका
से
जुड़ी
हुई
है।
वन
उत्पाद
में
(लकड़ी,
गोंद,
औषधियाँ),
पारंपरिक
चिकित्सा
प्रणालियाँ,
पशुपालन
एवं
कृषि,
सांस्कृतिक
एवं
धार्मिक
मान्यताएँ
जुडी
हुई
है। यह जनजातीय
समुदाय
प्रकृति
के
साथ
सह-अस्तित्व
का
उदाहरण
प्रस्तुत
करते
हैं।
जैव-विविधता
के
समक्ष कई
चुनौतियाँ जुडी
हुई
है जिनमें
अवैध
खनन,
शहरीकरण
और
औद्योगिकीकरण
व उसके
कचरे
का
निस्तारण,
वनों
की
कटाई,
जल
स्रोतों
का
सूखना,
जलवायु
परिवर्तन,
जैव-विविधता
का
विखंडन,
दिल्ली-एनसीआर
क्षेत्र
में इसकी
जैव-विविधता
सबसे
अधिक
प्रभावित
हुई
है।
संरक्षण
एवं
प्रबंधन
रणनीतियों
के
तहत
इसको
कई संरक्षण
उपायों
की
आवश्यकता
है,
जिनमें
इसको
इको-सेंसिटिव
ज़ोन
घोषित
करना,
वन्यजीव
गलियारों
का
संरक्षण,
सामुदायिक
वन
प्रबंधन,जैव-विविधता
रजिस्टर,
भौगोलिक
सूचना
प्रणाली
और
सुदूर
संवेदन
का
उपयोग,
पर्यावरणीय
शिक्षा
एवं
जन-जागरूकता
अभियान
है।
भविष्य
की
दिशा
व दशा
को
ध्यान
में
रखते
हुए
हमें
सतत
शहरी
नियोजन,
पारिस्थितिकी-आधारित
विकास
मॉडल,
वैज्ञानिक
पुनर्वनीकरण,
नीति-स्तर
पर
कठोर
क्रियान्वयन,
स्थानीय
समुदायों
की
भागीदारी
पर
केन्द्रित
होना
पडेगा।
इसकी
जैव-विविधता
केवल
वन्यजीवों
तक
सीमित
नहीं
है,
बल्कि
यह
हमारी
पर्यावरणीय
सुरक्षा
प्रणाली
का
अभिन्न
अंग
है।
यदि
इसकी
जैव-विविधता
का
संरक्षण
नहीं
किया
गया,
तो
मरुस्थलीकरण,
जल
संकट
और
जलवायु
असंतुलन
जैसी
समस्याएँ
गंभीर
रूप
धारण
कर
सकती
हैं।
अतः
इस
क्षेत्र
की
जैव-विविधता
का
संरक्षण
वर्तमान
और
भविष्य
दोनों
के
लिए
अनिवार्य
है।
अरावली
पर्वतमाला
का
भूवैज्ञानिक
महत्व है, यह
देश
की
प्राचीनतम
शैल
संरचना
का
हिस्सा है ।
यह
न केवल
भारत
की,
बल्कि
विश्व
की
प्राचीनतम
पर्वत
श्रृंखलाओं
में
से
एक
है।
इसकी
उत्पत्ति
भारतीय
भू-पटल
का
अभिन्न
अंग
है।
अरावली
पर्वतमाला
का
निर्माण
लगभग
2.5 से
3.2 अरब
वर्ष
पूर्व
युग
में
हुई,
जो
पृथ्वी
के
प्रारंभिक
भूगर्भीय
इतिहास
को
समझने
के
लिए
अत्यंत
महत्वपूर्ण
मानी
जाती
है।
अरावली
क्षेत्र
में
पाई
जाने
वाली
शैल
संरचनाएँ,
खनिज
संसाधन,
भ्रंश,
वलन
और
कायांतरण
प्रक्रियाएँ
भारतीय
भू-पटल
के
विकास
की
विस्तृत
जानकारी
प्रदान
करती
हैं।
यह
पर्वतमाला
भारतीय
क्रेटॉन
की
स्थिरता,
प्राचीन
महाद्वीपीय
निर्माण
और
प्लेट
विवर्तनिकी
के
अध्ययन
का
जीवंत
उदाहरण
है।
जहाँ
हिमालय
एक
नवीन
वलित
पर्वतमाला
है,
यह एक
अवशिष्ट
एवं
अत्यधिक
अपरदित
पर्वत
श्रृंखला
है।
इसकी
चट्टानें
अरबों
वर्ष
पुरानी
हैं
और
पृथ्वी
के
प्रारंभिक
भूगर्भीय
परिवर्तनों
की
साक्षी
हैं।
अरावली
सुपरग्रुप
एवं
शैल
संरचना
का
हिस्सा
है।
इसमें
पाई
जाने
वाली
शैल
संरचनाएँ
भूविज्ञान
के
अध्ययन
में
अत्यंत
महत्वपूर्ण हैं।
दिल्ली
सुपरग्रुप
उत्तर-पूर्वी
भाग
में
विकसित
है
जिसमें
अधिक
उन्नत
वलन
एवं
कायांतरण,
उच्च
ग्रेड
की
कायांतरित
शैलें
पाई
जाती
है
जिसके
कायांतरण
का
महत्व
है।
अरावली
क्षेत्र
में
क्षेत्रीय
कायांतरण
के
उत्कृष्ट
उदाहरण
मिलते
हैं।
यह
प्रक्रिया
अत्यधिक
ताप
एवं
दबाव
के
प्रभाव
को
दर्शाती
है,
जो
प्राचीन
पर्वतनिर्माण
की
पुष्टि
करती
है।
भ्रंश,
वलन
एवं
संरचनात्मक
विशेषताओं
में
सममित
एवं
असममित
वलन,
आइसोक्लाइनल
वलन,भू-पटल
में
दरारें
व खनिजों
के
संचयन
में
सहायक
सिद्ध
होते
हैं
। इसकी
संरचनात्मक
जटिलता
इसे
भूवैज्ञानिक
प्रयोगशाला
के
समान
बनाती
है।
खनिज
संसाधनों
का
भूवैज्ञानिक
भी
महत्व
रखता है,
यह
एक
प्रमुख
खनिज
क्षेत्र
है
जिसमें
तांबा
,जस्ता
एवं
सीसा
(ज़ावर),
संगमरमर
(मकराना),फॉस्फेट,
अभ्रक,
चूना
पत्थर
आदि
मिलते
हैं
यह
सब
खनिज
राज्य
की
भूवैज्ञानिक
उत्कृष्टता
का
प्रतीक
है।
यह
पर्वतमाला
भारतीय
क्रेटॉन
की
स्थिरता
का
प्रमाण
है।
इसमें
गोंडवाना
महाद्वीप
के
निर्माण
के
साक्ष्य
हैं,
प्राचीन
प्लेट
टकराव
के
चिन्ह
हैं,
व भारतीय
प्लेट
के
उत्तरगामी
संचलन
से
पहले
की
संरचना
मिलती
है
जो
भारतीय
प्लेट
की
भूवैज्ञानिक “रीढ़”मानी
जाती
है।
इसका
जल
विज्ञान
एवं
भूविज्ञान
का
संबंध
भी
है।
इसकी
शैल
संरचना
भूजल
संचयन
में
सहायक
है
जो
भ्रंश
एवं
दरारें
जल
धारण
करती
हैं,
एक्वीफर
निर्माण
करती
हैं,
व नदियों
का
(लूणी,
बनास)
उद्गम
स्थल
भी
है
जो
जल
सुरक्षा
के
लिए
भी
भूवैज्ञानिक
दृष्टि
से
महत्वपूर्ण
बन
जाता
है।
यह
वैज्ञानिक
एवं
शैक्षणिक
महत्व
भी
रखता
है,
जो
पृथ्वी
के
प्रारंभिक
इतिहास
का
अध्ययन
है,कायांतरण
एवं
वलन
प्रक्रियाओं
की
समझ
रखता
है,
खनिज
अन्वेषण
करता
है
व भू-आपदा
अध्ययन
भी
करता
है।
इसलिए
इन्हें
प्राकृतिक
भूवैज्ञानिक
प्रयोगशाला
कहा
जाता
है।
इसके
वर्तमान
खतरों
से
इसके
संरक्षण
की
आवश्यकता
इसलिए
क्योंकि
अवैध
खनन
से
शैल
संरचनाओं
का
विनाश
व भूवैज्ञानिक
विरासत
का
क्षरण
हो
रहा
है। जिसके
संरक्षण
उपायों
में
भू-पुरातत्व
विरासत
स्थल
की
घोशणा
हो।
खनन
गतिविधियों
का
वैज्ञानिक
नियमन
करना
होगा,
शोध
एवं
शिक्षा
को
बढ़ावा
देना
व जीआईएस
एवं
भू-स्थानिक
तकनीकों
का
उपयोग
करना
होगा।
इस
पर्वतमाला
का
भूवैज्ञानिक
महत्व
अतुलनीय
है।
जो
हमारे
प्राचीन
इतिहास
का
जीवंत
अभिलेख
है।
यदि
इसका
संरक्षण
नहीं
किया
गया,
तो
हम
न केवल
प्राकृतिक
संसाधनों
को,
बल्कि
पृथ्वी
के
इतिहास
के
अनमोल
अध्याय
को
खो
देंगे।
इस
पर्वतमाला
का
सांस्कृतिक
एवं
पर्यटन
महत्व
है
यह
भारतीय
सभ्यता
और
विरासत
की
जीवनरेखा
है।
यह
पर्वतमाला
भारत
की
प्राचीनतम
पर्वत
श्रृंखला
होने
के
साथ-साथ
भारतीय
सभ्यता,
संस्कृति,
स्थापत्य
और
पर्यटन
विकास
का
एक
महत्वपूर्ण
आधार
रही
है।
इसने
राजपूतकालीन
राज्यों
को
प्राकृतिक
सुरक्षा
प्रदान
की
है,
धार्मिक-आध्यात्मिक
केंद्रों
के
विकास
को
दिशा
दी
है
तथा
लोक
संस्कृति,
जनजातीय
परंपराओं
और
पारंपरिक
जीवनशैली
को
संरक्षित
किया
है।
वर्तमान
में
अरावली
पर्वतमाला
सांस्कृतिक
पर्यटन,
धार्मिक
पर्यटन,
विरासत
पर्यटन
और
पारिस्थितिकी
पर्यटन
का
एक
प्रमुख
केंद्र
बन
चुकी
है।
यह
एक
सांस्कृतिक,
ऐतिहासिक
और
पर्यटन
महत्व
का
विस्तृत
विवेचन
है।
यह
केवल
एक
भौगोलिक
संरचना
नहीं
है,
बल्कि
यह
भारतीय
सभ्यता
के
विकास
की
मूक
साक्षी
रही
है।यह
पर्वतमाला
ऐतिहासिक
युद्धों,
राजवंशों,
धार्मिक
आंदोलनों
और
सांस्कृतिक
उत्कर्ष
का
केंद्र
रही
है।
इसी
के
कारण
अनेक
नगर,
दुर्ग,
मंदिर
और
सांस्कृतिक
केंद्र
विकसित
हुए,
जो
आज
भारत
के
पर्यटन
मानचित्र
पर
महत्वपूर्ण
स्थान
रखते
हैं।
इसका
ऐतिहासिक-सांस्कृतिक
महत्व
है,
इसने
कई
राज्यों
जैसे-मेवाड़,
मारवाड़,
आमेर
और
मेवात
को
प्राकृतिक
सुरक्षा
प्रदान
की
है
जिनमें
चित्तौड़गढ,
कुंभलगढ़,
रणकपुर,
आमेर
आदि
किले
हैं।
इन
दुर्गों
और
स्थापत्य
संरचनाओं
में
राजपूत
शौर्य,
स्वाभिमान
और
सांस्कृतिक
गौरव
परिलक्षित
होता
है।
यह
जनजातीय
संस्कृति
का
संरक्षक
रहा
है
इस
क्षेत्र
में
अनेक
जनजातियाँ
निवास
करती
हैं
जैसे
भील,
मीणा,
राईका,
गरासिया,
कालबेलिया,
रेबारी,
गाड़िया
लुहार
आदि
हैं।
इन
समुदायों
की
लोककथाएँ,
नृत्य,
संगीत,
वेशभूषा
और
पर्व-त्योहार
यहां
की
सांस्कृतिक
विविधता
को
समृद्ध
करती
हैं,
यहां
कई
लोक
परंपराएँ
एवं
कलाऐं है,
जिनमें
नृत्य,
लोकसंगीत,
वीर
गाथाएँ,
हस्तशिल्प,
पत्थर
कला
व मीनाकारी
आदि
है।
यहां
की
पृष्ठभूमि
की
विकसित
परंपराएँ
भारतीय
लोक
संस्कृति
का
अभिन्न
अंग
हैं।
यहां
धार्मिक
एवं
आध्यात्मिक
महत्व
के
कई
महत्वपूर्ण
स्थान
हैं
जो
विश्व
प्रसिद्ध
संगमरमर
स्थापत्य
के
अद्वितीय
उदाहरण
हैं।
इस
क्षेत्र
में
अनेक
जैन,
हिन्दू
धार्मिक
स्थल
एवं
सूफी
दरगाहें
भी
स्थित
हैं,
जो
धार्मिक
सहिष्णुता
और
सांस्कृतिक
समन्वय
का
प्रतीक
हैं
जिससे
इस
क्षेत्र
की
आध्यात्मिकता
परिलक्षित
होती
है।
विरासत
पर्यटन
में
किले,
महल
और
ऐतिहासिक
नगर
प्रमुख
पर्यटन
केंद्रों
में
आते
हैं,
जिनमें
उदयपुर,
जयपुर,
अलवर,
अजमेर,
राजसमंद,
सिरोही,
जैसलमेर
आदि
हैं
व यूनेस्को
विश्व
धरोहर
स्थलों
में
शामिल
अनेक
संरचनाएँ भी
इस
क्षेत्र
में
स्थित
हैं।
धार्मिक
एवं
तीर्थ
पर्यटन
में
माउंट
आबू,
रणकपुर,
अंबाजी,
पुष्कर,
अजमेर,
जयपुर
आदि
मुख्य
हैं।
जिनका
भ्रमण
करने
देश-विदेश
के
पर्यटक
व श्रद्धालु
आते
हैं।
पारिस्थितिकी
एवं
साहसिक
पर्यटन
में
अनुसरण,
नेचर
ट्रेल्स,
पक्षी
अवलोकन,
वन्यजीव,
सफारी
आदि
महत्वपूर्ण
हैं। रणथम्भौर,
सरिस्का,
टाटगढ़,
झालाना,
माउंट
आबू
आदि
वन्यजीव
अभयारण्य
पर्यावरण-पर्यटन
के
प्रमुख
केंद्र
हैं।
शहरी
एवं
सप्ताहांत
पर्यटन
के
तहत
दिल्ली-एनसीआर
क्षेत्र
में इन
पहाड़ियों
का
महत्व
है
इस
प्राकृतिक
विश्राम
स्थल
को
शहरी
फेफड़े
कहा
जाता
है,
यहां
कई
प्रकृति-आधारित
पर्यटन
केंद्र
संस्थापित
हैं।
सांस्कृतिक
पर्यटन
और
स्थानीय
अर्थव्यवस्था
पर
आधारित
पर्यटन
कई
समुदायों
की
आजीविका
का
प्रमुख
स्रोत
है,
जिनमें
होटल
एवं
आतिथ्य
उद्योग,
हस्तशिल्प
एवं
स्थानीय
बाजार,
लोक
कलाकारों
को
रोजगार
और
महिला
स्वयं
सहायता
समूहों
को
अवसर
मिलता
है।
इन
सब
को
विकसित
होने
के
लिए
कई
चुनौतियाँ
एवं
संकट
का
सामना
करना
पड़ता
है,
जिसमें
अनियंत्रित
पर्यटन,
विरासत
स्थलों
का
क्षरण,
पर्यावरणीय
दबाव,
सांस्कृतिक
व्यवसायीकरण
शामिल
है।
यदि
सतत
पर्यटन
नीति
नहीं
अपनाई
गई,
तो
यहां
की
सांस्कृतिक
पहचान
को
गंभीर
खतरा
हो
सकता
है।
सतत
पर्यटन
हेतु
रणनीतियों
में
विरासत
संरक्षण
योजनाएँ,
इको-टूरिज्म
मॉडल,
स्थानीय
समुदाय
की
भागीदारी,
क्षमता-आधारित
पर्यटन,
डिजिटल
एवं
स्मार्ट
पर्यटन
प्रबंधन
आदि के
बल
पर
विस्तार
को
गति
मिल
सकती
है।
भविष्य
में
इसको
विकसित
करने
की
कई
संभावनाएँ
है,
जिसमें
विरासत-आधारित
पर्यटन
सर्किट,
जियो-टूरिज्म,
ग्रामीण
एवं
जनजातीय
पर्यटन,
सांस्कृतिक
महोत्सवों
का
विकास
शामिल
है।
यदि
अरावली
का
संरक्षण
सांस्कृतिक
संवेदनशीलता
और
पर्यावरणीय
संतुलन
के
साथ
किया
जाए,
तो
यह
क्षेत्र
भारत
के
पर्यटन
विकास
का
वैश्विक
मॉडल
बन
सकता
है।
यह पर्वतमाला
क्षेत्रीय
समुदायों
के
लिए
सामाजिक,
आर्थिक
एवं
सांस्कृतिक
जीवनरेखा
है।
इस
क्षेत्र
में
रहने
वाले
समुदायों
की
जीवनशैली
प्राकृतिक
संसाधनों,
वन
संपदा,
जल
स्रोतों
और
सांस्कृतिक
परंपराओं
से
गहराई
से
जुड़ी
हुई
है।
ऐतिहासिक
रूप
से
अरावली
ने
मानव
बस्तियों
को
संरक्षण,
संसाधन
और
सांस्कृतिक
आधार
प्रदान
किया
है।
यहां
प्राचीन
काल
से
मानव
बसावट
विकसित
हुई
है।
यहां
जल
स्रोतों
के
निकट
गाँवों
का
विकास
हुआ।
प्राकृतिक
सुरक्षा
के
कारण
स्थायी
बस्तियाँ
बसी
व कृषि
और
पशुपालन
आधारित
समाज
विकसित
हुईं।
इन
समुदायों
की
सामाजिक
संरचना
में
सामूहिक
जीवन
सम्मलित
है।
यह
पर्वतमाला
क्षेत्रीय
लोगों
के
लिए
केवल
पहाड़ों
की
श्रृंखला
नहीं,
बल्कि
सामाजिक
संरचना,
आर्थिक
सुरक्षा
और
सांस्कृतिक
आत्मा
का
आधार
है।
यदि
अरावली
का
संरक्षण
नहीं
किया
गया,
तो
इससे
जुड़ी
सभ्यताएँ,
परंपराएँ
और
आजीविकाएँ
भी
संकट
में
पड़
जाएँगी।
अतः
इसका
संरक्षण
क्षेत्रीय
विकास,
सामाजिक
न्याय
और
सांस्कृतिक
निरंतरता
के
लिए
अनिवार्य
है।
यहां
की
वनस्पति
एवं
जीव-जंतु
क्षेत्रीय
समुदायों
के
जीवन,
आजीविका
और
संस्कृति
का
आधार
है।
वनस्पति
और
जीव-जंतु
केवल
पारिस्थितिक
तंत्र
का
हिस्सा
नहीं
हैं,
बल्कि
इस
क्षेत्र
में
रहने
वाले
लोगों
के
जीवन,
आजीविका,
स्वास्थ्य,
संस्कृति
और
सामाजिक
संरचना
के
मूल
आधार
हैं।
यहां
की
जैव-विविधता
जल
सुरक्षा,
खाद्य
सुरक्षा,
पारंपरिक
चिकित्सा,
पशुपालन,
कृषि
तथा
सांस्कृतिक
परंपराओं
को
प्रत्यक्ष
रूप
से
प्रभावित
करती
है।
यह
उत्तर-पश्चिम
भारत
का
एक
प्रमुख
जैव-विविधता
क्षेत्र
है।
यहाँ
पाई
जाने
वाली
वनस्पतियाँ
और
जीव-जंतु
शुष्क
एवं
अर्ध-शुष्क
जलवायु
में
भी
जीवन
को
संभव
बनाते
हैं।
स्थानीय
ग्रामीण
और
जनजातीय
समुदाय
सदियों
से
इन
प्राकृतिक
संसाधनों
पर
निर्भर
रहे
हैं।
अरावली
की
वनस्पति
वर्षा
आधारित
कृषि
को
संभव
बनाती
है।
जिसका
औषधीय
महत्व बहुत
अधिक
है
यह
औषधीय
पौधे
पाए
जाते
हैं
जिनमें
गिलोय,
अश्वगंधा,
गुग्गुल,
सतावर
जनजातीय
समुदाय
पारंपरिक
चिकित्सा
में
इनका
उपयोग
करते
हैं।
यहां
की
वनस्पति
और
जीव-जंतु
क्षेत्रीय
लोगों
के
लिए
जीवन
रेखा
के
समान
हैं।
ये
न केवल
भोजन,
जल
और
औषधि
प्रदान
करते
हैं,
बल्कि
सामाजिक
संरचना,
सांस्कृतिक
पहचान
और
आर्थिक
स्थिरता
को
भी
बनाए
रखते
हैं।
यदि
इसकी
जैव-विविधता
का
संरक्षण
नहीं
किया
गया,
तो
इससे
मानव
जीवन
और
पारिस्थितिक
संतुलन
दोनों
पर
गंभीर
प्रभाव
पड़ेगा।
अतः
अरावली
की
वनस्पति
एवं
जीव-जंतुओं
का
संरक्षण
क्षेत्रीय
विकास
और
मानव
कल्याण
के
लिए
अनिवार्य
है।
यह
पर्वतमाला,
राजस्थान
में
जल
संचयन,
जल
प्रबंधन
एवं
जनजीवन
के
लिए
इसका
बहुआयामी
महत्व
रखती
है।
यह
राजस्थान
जैसे
शुष्क
एवं
अर्धदृशुष्क
राज्य
के
लिए
प्राकृतिक
जल
संचयन
प्रणाली
का
कार्य
करती
है।
इसकी
भूगर्भीय
संरचना,
जलग्रहण
क्षेत्र,
वनस्पति
आवरण
एवं
पारंपरिक
जल
संरचनाएँ
वर्षा
जल
को
संचित
कर
भूजल
पुनर्भरण,
सतही
जल
उपलब्धता
और
दीर्घकालीन
जल
सुरक्षा
सुनिश्चित
करती
हैं।
अरावली
से
निकलने
वाली
नदियाँ,
तालाब,
जोहड़,
बावड़ियाँ
और
नाड़ियाँ
ग्रामीण
एवं
शहरी
समुदायों
की
कृषि,
पशुपालन,
पेयजल
तथा
सांस्कृतिक
जीवन
का
आधार
हैं।
यहां
की
आधारित
जल
प्रबंधन
की
सर्वोत्तम
प्रथाओं,
उनके
सकारात्मक
परिणामों,
सामाजिक
व्यवहार,
दृष्टि,
तंत्र
और
अपेक्षित
भविष्यगत
परिणामों
का
समग्र
विश्लेषण
है।
राजस्थान,
भारत
का
सर्वाधिक
जल
अभावग्रस्त
राज्य
है,
जहाँ
औसत
वार्षिक
वर्षा
सीमित,
अनियमित
और
क्षेत्रीय
रूप
से
असमान
है।
यह
भारत
के
जल
विभाजक
के
तौर
पर
कार्य
करती
है।
ऐसे
परिदृश्य
में
यह
प्राकृतिक
जल-सुरक्षा
ढाल
के
रूप
में
कार्य
करती
है।
यह
वर्षा
जल
को
रोकती
है,
सतही
बहाव
को
नियंत्रित
करती
है,
भूजल
स्तर
को
स्थिर
करती
है,
नदियों,
झीलों
और
जलाशयों
को
जीवन
देती
है,
यह
जल
आधारित
सभ्यता
की
आधार
शिला
है।
यह
जल
संचयन
का
प्राकृतिक
तंत्र
है
इसकी
भूगर्भीय
संरचना
की
भूमिका
में
दरारयुक्त
एवं
भ्रंशयुक्त
चट्टानें
हैं,
जल
को
अवशोषित
करने
वाली
परतें
है
और
प्राकृतिक
एक्वीफर
निर्माण
करते
हैं।
ये
सभी
तत्व
वर्षा
जल
को
धरती
के
भीतर
पहुँचाकर
भूजल
पुनर्भरण
में
सहायक
होते
हैं।
यह
पर्वतमाला
अनेक
छोटे
बड़े
जलग्रहण
क्षेत्रों
का
निर्माण
करती
है,
जिनसे
बनास,
लूणी,
माही
की
सहायक
धाराएँ,
साबरमती
का
उद्गम
क्षेत्र
विकसित
होते
हैं।
सर्वोत्तम
प्रथाओं
में
इसकी
पारंपरिक
जल
संचयन
संरचनाओं
में
इनके
प्रयोग
में
जोहड़ –(सामुदायिक
जल
संचयन
और
भू-जल
पुनर्भरण,
बावड़ी
(पेयजल
एवं
सामाजिक
केंद्र
), तालाब
एवं
झीलें–(कृषि
और
जल
आपूर्ति),
नाड़ी
एवं
कुंड
मरुस्थलीय
क्षेत्रों
की
जल
जीवनरेखा
है।
इसके
सामुदायिक
जल
प्रबंधनों
में,
ग्राम
स्तर
पर
जल
समितियाँ, जल
उपयोग
के
पारंपरिक
नियम,
सामूहिक
श्रम
(श्रमदान)
आदि
जुडे
हुए
हैं।
वनस्पति
आधारित
जल
संरक्षण
में
खेजड़ी, बबूल,
रोहिडा,
नीम,
आम,
जामुन,
ढाक,
बेर
आदि
जैसे
वृक्ष,
मृदा
अपरदन
नियंत्रण,
इसके
प्राप्त
सकारात्मक
परिणामों
में
भूजल
स्तर
में
वृद्धि,
सूखा
प्रभाव
में
कमी,
कृषि
उत्पादन
में
सुधार,
पशुपालन
को
स्थायित्व,
ग्रामीण
पलायन
में
कमी
रहे हैं।
अलवर
जिले
का
जोहड़
आंदोलन
इसका
जीवंत
उदाहरण
है।
इसकी
सामाजिक
प्रतिक्रियाओं
में समुदायों
में
जल
संरक्षण
के
प्रति
जागरूकता
है,
पारंपरिक
ज्ञान
का
पुनरुत्थान
है
व जल
को
साझा
संसाधन
के
रूप
में
स्वीकार्यता
है।
सामाजिक
दृष्टिकोण
और
व्यवहार
से
जल
के
प्रति
सांस्कृतिक
दृष्टिकोण
अपनाया
है
जिसमें
जल
को “जीवन” और “पवित्र
तत्व”मानना
है
व जल
स्रोतों
से
जुड़े कई
धार्मिक
अनुष्ठान
है।
सामुदायिक
व्यवहार
की
दृष्टि
से
जल
का
संयमित
उपयोग,
सामाजिक
दंड
की
परंपरा,
साझा
उत्तरदायित्व
की
भावना
रखनी
होती
है।
नीति
एवं
प्रशासनिक
प्रतिक्रिया
में
वर्षा
जल
संचयन
को
अनिवार्य
बनाना,
जल
संरक्षण
योजनाएँ
इस
क्षेत्र
में
खनन
पर
नियंत्रण,
जलग्रहण
विकास
कार्यक्रम
है।
इस
पर्वतमाला
को
राजस्थान
की
दीर्घकालीन
जल
सुरक्षा
प्रणाली
के
रूप
में
विकसित
करना,
होगा
जिसमें
पारंपरिक
और
आधुनिक
तकनीक
का
समन्वय
हो,
समुदाय
केंद्रित
जल
प्रबंधन
हो,
पारिस्थितिकी
आधारित
विकास
हो।
इसी
से
प्रेरणा
लेकर
जल
संकट
से
आत्मनिर्भरता,
भावी
पीढ़ियों
के
लिए
संसाधन
संरक्षण
रहेगा,
स्थानीय
ज्ञान
की
उपयोगिता
बढ़ेगी
व जल
संस्कृति
का
पुनर्जागरण
होगा।
इस
कार्य
तंत्र
में
जल
विभाजन
आधारित
योजना
बनाना,
भौगोलिक
संरचना
प्रणाली
व सूदूर
तकनीक
द्वारा
जल
नियोजन,
सामुदायिक
सहभागिता
बढ़ाना
व बहुदृस्तरीय
शासन
लाना
है।
जिससे
स्थायी
जल
उपलब्धता,
सुदृढ़
ग्रामीण
अर्थव्यवस्था,
पारिस्थितिक
संतुलन
व जल
आधारित
आजीविकाओं
का
लाभ
मिलेगा
और
अपेक्षित
परिणाम
जैसे
जल
संकट
में
दीर्घकालीन
कमी,
जलवायु
परिवर्तन
के
प्रति
अनुकूलन,
कृषि
एवं
पशुपालन
में
स्थिरता,
सामाजिक
समरसता
और
आत्मनिर्भरता
मिलेंगे।
इस
प्राचीनतम
पर्वत
श्रृंखला
के
भविष्य
से
जुडे
एक
महत्वपूर्ण
प्रकरण
का
हाल
ही
में
सुप्रीम
कोर्ट
निर्णय
आया
है।
यह
फैसला
पारिस्थितिक
संरक्षण,
खनन,
तथा
अरावली
की
कानूनी
परिभाषा
के
मुद्दे
पर
केंद्रित
है,
और
इसका
सामाजिक-राजनीतिक-पर्यावरणीय
असर
स्पष्ट
रूप
से
दिखाई
दे
रहा
है।
इस
निर्णय
के
संदर्भ
में
अरावली
पर्वतमाला
पर
लंबे
समय
से
यह
विवाद
रहा
है
कि
अरावली
की “कानूनी” परिभाषा
क्या
होनी
चाहिए
? और
इसी
से
जुड़े
कई
मुद्दों
पर
सुप्रीम
कोर्ट
कई
दशकों
से
सुनवाई
कर
रहा
है
(यह
मामला
मूलतः
एम
सी
मेहता
पर्यावरण
मामले
का
हिस्सा
है) नवम्बर
2025
में
सुप्रीम
कोर्ट
ने
पर्यावरण
मंत्रालय
की
सिफारिशों
को
स्वीकार
करते
हुए
अरावली
की
एक “समान
परिभाषा”को
मंज़ूर
किया
और
संबंधित
दिशा-निर्देश
दिए।
जिसकी
संयुक्त
परिभाषा
के
अनुसार
(1
) अरावली
पहाड़
स्थानीय
भूभाग
से
100
मीटर
से
अधिक
ऊँचाई
वाला
भू-आकार
है।
(2)
अरावली
श्रृंखला
500
मीटर
की
दूरी
में
दो
या
अधिक
ऐसे
पहाड़ों
/ टीलों
का
समूह
हो।
इसका
मतलब
यह
था
कि
अब
केवल
वे
हिस्से
ही
अरावली
कानूनी
रूप
से
माने
जाएंगे,
जिनकी
स्थानीय
उभर
100
मीटर
से
अधिक
है
जो
अध्ययन
के
अनुसार
पहले
के
मुकाबले
बहुत
छोटा
हिस्सा
है।
विशेषज्ञों
का
मानना
है
कि
इससे
लगभग
90
%
अरावली
ऊपर
से
बाहर
हो
सकती
है। सुप्रिम
कोर्ट
ने
इस
आदेश
पर
अब
29
दिसम्बर,
2025
को
रोक
लगा
दी
है.
अब विशेषज्ञों
की
राय
के
लिए
कमेटी
गठित
होगी
उसकी
राय
पर
आगे
सुनवाई
होकर
फैसला
होगा।
अपने
पुराने
आदेश
में
अदालत
ने
नए
खनन
पट्टों
पर
रोक
लगाई
है
व पुरानी
खदानें
सीमित
शर्तों
के
तहत
चल
सकती
हैं,
मगर
नए
पट्टे
जारी
नहीं
किए
जा
सकेंगे
जब
तक
एक
सतत
खनन
प्रबन्ध
योजना
तैयार
नहीं
हो
जाती
। कोर
ज़ोन
जहाँ
संरक्षण
व प्राथमिकता
ज़्यादा
है,
वहाँ
खनन
पूरी
तरह
प्रतिबंधित
रखा
गया
है।
पर्यावरणीय
की
दृष्टि
से
इस
फैसले
का
महत्व
यह है
कि
अरावली
पहाड़ियाँ
थार
मरुस्थल
के
फैलाव
को
रोकती
हैं,
भूजल
के
पुनर्भरण
में
भूमिका
निभाती
हैं,
प्रदूषण
नियंत्रण
और
जैव-विविधता
को
संरक्षित
करती
हैं।
इनका
कमजोर
होना
आबादी,
किसानों,
ग्रामीणों
और
देश
के
बड़े
हिस्सों
के
लिए
खतरा
है।
सुप्रीम
कोर्ट
ने
परिभाषा
को
संशोधित
करते
हुए
इसे ‘वैज्ञानिक
आधार’पर
तय
करने
की
कोशिश
की
है,
लेकिन
इसके
पर्यावरणीय
निहितार्थ
विवादित
हैं। जिस
पर
विरोध,
चिंताएँ
और
प्रतिक्रियाएँ दर्ज
हुई।
विशेषज्ञों
का
मानन
है
कि
नई
परिभाषा
से
इस
पर्वत
का
बड़ा
हिस्सा
संरक्षण
से
बाहर
हो
जाएगा,
इससे
खनन,
अवैध
निर्माण,
और
अतिक्रमण
को
बढ़ावा
मिल
सकता
है
व भले
ही
उच्च
ऊँचाई
वाले
हिस्सों
को
सुरक्षा
मिले,
कम
ऊँचाई
वाले
टीले
भी
पारिस्थितिक
रूप
से
मायने
रखते
हैं
जिनका
संरक्षण
भी
आवश्यक
है।
इस
फैसलें
की
राजनीतिक,
जन-विरोधात्मक
प्रतिक्रिया
व आलोचना
हुई है
। इसे
राज्य
के
लिए
पर्यावरणीय
आपदा
बताया
गया
था।
उनका
कहना
है
कि
लगभग
90 %
अरावली
को
फैसले
से
बाहर
कर
देना
राजस्थान
के
पारिस्थितिक
संतुलन
के
लिए
खतरनाक
है
और
कोर्ट
से
पुनर्विचार
की
मांग
की
थी। इस
संभावित
प्रभाव जो
संरक्षण
पक्ष
चाहता
है
उसमें
कोर
क्षेत्र
को
संरक्षण
मिलता
रहे
व सतत
खनन
प्रबंधन
योजना
तैयार
होने
तक
नए
पट्टे
नहीं
दिए
जाएंगे।
जो
पर्यावरण
एवं
सामाजिक
चिंता
बढ़ाती
है
उसमें
कम
ऊँचाई
वाले
पहाड़ों
पर
अब
खनन
और
निर्माण
कार्य
के
दरवाज़े
खुल
सकते
थे।
इससे
भूजल
पुनर्भरण,
धूल
प्रदूषण,
रेत
और
मिट्टी
का
क्षरण,
स्थानीय
जलवायु
पर
प्रतिकूल
प्रभाव
हो
सकता
है।
दिल्ली,
राजस्थान,
हरियाणा
और
गुजरात
में
पर्यावरणीय
संतुलन
पर
यह
फैसला
गंभीर
असर
डाल
सकता
था।
इसके
लिए
विशेषज्ञों
की
राय
और
आगे
की
चुनौतियाँ
जो
हैं
उन्हें
पर्यावरण
विशेषज्ञ
इसे
संरक्षण
के
लिए
उचित
कदम
मानते
हैं
अगर
यह
तंत्र
को
सुदृढ़
करने
वाला
नियम
बने
। लेकिन
कुछ
विद्वानों
का
कहना
है
कि
केवल
ऊँचाई
आधारित
परिभाषा
से
वास्तविक “अरावली
पहाड़ियाँ”की
पारिस्थितिकी
खतरे
में
पड़
सकती
है
व भूतल
के
छोटे-छोटे
टीले,
ऊँचाई
से
नीचे
भी,
भूमिगत
जलभरण
और
हवा
के
मार्गों
को
प्रभावित
करते
हैं
और
उन्हें
सुरक्षित
रखना
भी
उतना
ही
आवश्यक
है।
सुप्रीम
कोर्ट
का
यह
निर्णय
अरावली
के
संरक्षण
के
प्रयास
और
खनन
एवं
आर्थिक
गतिविधियों
के
संतुलन
का
एक
प्रयास
है,
पर
इसे
पर्यावरणविदों,
राजनीतिक
नेतृत्व
और
स्थानीय
समुदायों
के
बीच
विवाद
के
रूप
में
देखा
जा
रहा
है।
समस्या
का
मूल
सवाल
यह
है
कि
क्या
पहाड़ियों
की
केवल
ऊँचाई
आधारित
परिभाषा
पर्यावरण
संरक्षण
के
बेहतर
परिणाम
देगी,
या
इससे
पारिस्थितिकी
और
मानव-जीवन
संतुलन
को
खतरा
होगा
?
यह
निर्णय
निश्चित
ही
ऐतिहासिक
था
और
इसे
पर्यावरण,
सामाजिक-आर्थिक
विकास,
और
प्राकृतिक
संरक्षण
के
व्यापक
आयामों
में
समझना
आवश्यक
है।
आज
यह
विषय “संरक्षण
बनाम
विकास”की
बहस
का
केंद्रीय
मुद्दा
बन
गया
है।
सर्वोच्च
न्यायालय
ने
दिनांक
29.12.2025 को
स्वतः
संज्ञान
लेकर
पूर्व
के
फैसले
20.11.2025 पर
रोक
लगा
दी
है।
जिसमें
उसने
इस
पर्वतमाली
की
परिभाषा
और
सीमा
तय
कर
नियम
स्वीकार
किये
थे।
अब स्थगन
तक
पुराने
फैसले
और
कमेटी
रिर्पोट
को
लागू
नही
किया
जायेगा, जब
तक
व्यापक
वैज्ञानिक
समीक्षा
नहीं
हो
जाती
है।
कोर्ट
ने
उच्च
स्तरीय
विशेषज्ञ
समिति
बनाने
का
निर्देश
दिया
है,
जो
विस्तार
से
आरावली
की
परिभाषा
और
पर्यावरणीय
प्रभाव
की
समीक्षा
करेगी।
इस
निर्णय
से
संकेत
मिलता
है
कि
भविष्य
में
हमारी
अरावली की
रक्षा,
सुरक्षा
व संरक्षण
की
नीति
और
अधिक
सख्त,
वैज्ञानिक
और
संवेदनशील
होगी।
वरिष्ठ प्राध्यापक
(डॉ.)
रिपुन्जय सिंह
(लेखक
-हरीश
चंद्र
माथुर
राजस्थान
राज्य
लोक
प्रशासन
संस्थान,
जयपुर
में
शहरी
विकास के वरिष्ठ
प्राध्यापक एवं
आपदा
प्रबन्धन
के
प्रभारी
अधिकारी
एवं
राजस्थान
कर्मचारी
चयन
बोर्ड
के
सदस्य
रहे
हैं।
)
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hear Arnab Goswami
interview with former CJI Gavai 19 minutes
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